Tuesday, 5 July, 2022
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2जी पर फैसले के बाद डीएमके अब भाजपा के लिए अछूत नहीं रही

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यह फैसला द्रमुक के काडरों को उत्साहित करने और स्टालिन को स्थापित करनेवाला है, खासकर अन्नाद्रमुक में बढ़ते भ्रम को अगर देखें.

2जी घोटाला ऐसा था, जिसने कुछ राजनीतिक दलों में भूचाल ला दिया तो 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और द्रमुक की हार भी इसी वजह से हुई. छह साल बाद आज आए कोर्ट के फैसले को पूरा देश देख रहा था. हालांकि, किसी एंटी-क्लाइमैक्स की तरह ही कोर्ट ने सभी 16 आरोपियों को छोड़ दिया, जिसमें पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और द्रमुक अध्यक्ष करुणानिधि की बेटी कनिमोई भी शामिल हैं.

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फैसले के राज्य और राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं, जिससे राजनीतिक ताकतों का पुनर्गठन भी संभव है. द्रमुख को इसका खासा फायदा मिलेगा क्योंकि पार्टी ने 2014 के चुनाव में शिकस्त मुख्यतः 2जी घोटाले की वजह से ही खायी थी. पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता ने इसे जमकर चुनावी मुद्दा बनाया और भुनाया भी.

गुरुवार को आया फैसला राज्य में द्रविड़ दलों को मजबूत करेगा, यह तय है. फैसले के पहले ही, द्रुमुक जयललिता के बाद के समय में मजबूत बनकर उभरा है, क्योंकि पिछले एक साल में अन्नाद्रमुक तीन तरफ से बंट चुका है. जयललिता के बाद अन्नाद्रमुक में कोई करिश्माई नेता भी नहीं है.

करुणानिधि ने हालांकि खुद को खींच लिया है औऱ अपने दूसरे बेटे एम के स्टालिन को ही केंद्र में रख रहे हैं, पर स्टालिन में वह करिश्मा नहीं है. चूंकि द्रमुक काडर आधारित पार्टी है, तो वह पिछले एक साल से एक बनी हुई है. फैसले का प्रभाव ज़ाहिर तौर पर काडरों को उत्साहित करेगा और स्टालिन मजबूत होंगे. इसके अलावा, अन्नाद्रुमक में इतना अधिक भ्रम है कि जयललिता की मौत के बाद बने राजनीतिक शून्य को भरने में द्रमुक के लिए यह टॉनिक का काम करेगा.

दूसरे, द्रमुक शायद तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक विरोधी ताकतों के लिए शायद एक अहम राजनीतिक प्लेटफॉर्म का काम करे. भविष्य में नए गठबंधन साझीदार तलाशने में द्रमुक को इस फैसले से सहायता मिलेगी.

भाजपा के लिए भी अब द्रमुक शायद अछूत नहीं रही. लगभग एक साल तक अन्नाद्रमुक की पीठ पर सवार होने का सोच रही भाजपा अब मोहभंग से ग्रस्त होकर राज्य में कहीं भी पांव टिकाने की जगह तलाश रही है, जहां अब तक इनका एक भी विधायक नहीं है. दरअसल, हाल ही में जब प्रधानमंत्री मोदी करुणानिधि के आवास पर गए तो इसके भी कयास लगाए गए थे कि द्रमुक जल्द ही राजग का हिस्सा बन कर वापसी करेगा.

इस बात की भी संभावना जतायी जा रही है कि दोनों पार्टी के बीच एक समझौता हो चुका है. इसके मुताबिक द्रमुक के हक में फैसला आने पर दोनों दल मिलकर 2019 का चुनाव लड़ेंगे. द्रमुक के पास लगभग 31.6 फीसदी का मजबूत वोट प्रतिशत है औऱ कोई भी पार्टी जो इसके साथ गठबंधन करेगी, वह अच्छा कर सकती है.

तीसरे, फैसले से शायद द्रमुक को आर के नगर उपनचुनाव में भी फायदा मिल सकता है, क्योंकि चुनाव के दौरान ही कयास लगाए जा रहे थे कि द्रमुक विजेता बनकर उभरेगा. उप-चुनाव जयललिता की मौत की वजह से खाली सीट पर हो रहा है. द्रमुक ने मारुतु गणेश को खड़ा किया है, जो पहले पत्रकार रह चुके हैं. फैसले से द्रमुक की संभावनाएं बढ़ी लगती हैं.

चौथी बात यह कि सत्ताधारी अन्नाद्रमुक- ई पलानीस्वामी, ओ पनीरसेल्वम गुट- शायद एक उत्साही द्रमुक से 2019 के लोकसभा चुनाव में मात खा जाए. यदि भाजपा द्रमुक के साथ एक साझीदार के तौर पर जाना चाहती है तो अन्नाद्रमुक सीधे तौर पर बिना किसी साख वाले उम्मीदवार के न होने की वजह से बिखर जाएगी. कांग्रेस को तब दूसरे विकल्प तलाशने होंगे.

फैसला कांग्रेस के लिए भी संजीवनी की तरह आया है, जो हालिया गुजरात चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर फूल रही थी. राहुल को व्यक्तिगत तौर पर बढ़त मिलेगी औऱ कांग्रेस अपना गठबंधन द्रमुक के साथ जारी रखना चाहेगी. यह कांग्रेस के नए अध्यक्ष को अगले साल के विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए नया गठबंधन तैयार करने में भी सहायता करेगा.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दावा किया, ‘फैसला खुद ही बोल रहा है.’

हालांकि, सीबीआई अपील करेगी लेकिन सवाल उटता है कि क्या यह मामला भी फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ की तरह है? क्या कहीं कोई घपला या घोटाला नहीं था? क्या यह तत्कालीन कैग विनोद राय की कल्पना थी, या यह कुछ औऱ था? सीबीआई ने कमज़ोर मुकदमा क्यों बनाया, जैसा कि न्यायाधीश ने टिप्पणी की, अगर कोई भी दोषी नहीं पाया गया, तो छह साल तक मामले को घसीटने की क्या जरूरत थी? फिलहाल, इन सवालों के कोई जवाब नहीं हैं.

कल्याणी शंकर एक स्तंभकार हैं, हिंदुस्तान टाइम्स की पूर्व राजनीतिक संपादक और वाशिंगटन संवाददाता रह चुकी हैं.

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