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2जी घोटाले पर अदालत का फैसला विश्वसनीयता का और बड़ा संकट पैदा कर सकता है क्योंकि इसने मंत्रालय से लेकर ऑडिटर और जांचकर्ता तक सबको शर्मसार कर दिया है.

इस फैसले पर जो राजनीतिक अफरातफरी मची है उसने इस मामले में भारतीय नौकरशाही पर घोर दोषारोपण को गौण कर दिया है, कि उसने संस्थाओं को किस तरह धोखा दिया, गलतबयानी की, अपनी सुविधा से तथ्यों को उलझाया तथा तोड़मरोड़ किया और जरूरी मौके पर सामूहिक जिम्मेदारी दिखाने से परहेज किया.

एक स्तर पर आपको एच.सी. गुप्ता जैसे व्यक्ति के लिए अफसोस हो सकता है, जिन्हें तत्कालीन कोयला सचिव के तौर पर कोयला खदान आवंटन में आपराधिक साजिश करने के लिए दोषी ठहराया गया हालांकि कई लोगों को यह ज्यादा से ज्यादा ‘प्रशासनिक लापरवाही’ लगी. जो भी हो, 2जी मामले ने भारतीय नौकरशाही के दूसरे चेहरे को उजागर कर दिया है.

अब हम जरा शांत होकर मामले का विश्लेषण करें. प्रशासनिक मंत्रालय- इस मामले में दूरसंचार मंत्रालय- के सचिव एक नौकरशाह हैं; नियमनकर्ता ‘ट्राइ’ के मुखिया एक नौकरशाह हैं और पूर्व दूरसंचार सचिव हैं; इसे एक घोटाला बताने वाले ऑडिटर भी एक आइएएस अधिकारी हैं, जो वित्त मंत्रालय में सचिव (वित्तीय सेवाएं) रह चुके हैं. जांचकर्ता- सीबीआइ और प्रवर्तन निदेशालय- भी नौकरशाहों के अधीन हैं हालांकि वे अलग सेवाओं से आए हैं.

मंत्रालय, नियमनकर्ता, ऑडिटर और जांचकर्ता मिलकर एक ऐसा भारी घालमेल करते हैं जिसमें से कुछ बरामदगी नहीं होती, किसी को दोषी नहीं पाया जाता और घोटाले को लेकर जनता के बीच लाखों करोड़ की राशि की जो अटकले लगाई जाती हैं उनकी अब तक पुष्टि नहीं की जाती. दूसरी ओर, एक उभरते हुए महकमे को इन सात-आठ वर्षों में भारी झटका पहुंचाया जाता है, रोजगार खत्म होते हैं और भारत के विकास की विश्वसनीयता को चोट पहुंचती है.

इससे भी बुरी बात यह है कि अदालत के फैसले से विश्वसनीयता का कहीं बड़ा संकट पैदा हो सकता है क्योंकि इसने मंत्रालय से लेकर ऑडिटर और जांचकर्ता तक सबको शर्मसार कर दिया है. यह किसी भी विदेशी निवेशक में संदेह पैदा कर सकता है. अब तक, व्यवसाय शुरू करने के अड़ंगों को लेकर अधिकतर शिकायतें लालफीताशाही और सुस्त न्याय प्रक्रिया से रही हैं. इसमें अगर हम प्रबुद्ध, जानकार और सुधारवादी नौकरशाही के अभाव को भी जोड़ दें, तो चिंता की वजहें और बढ़ जाती हैं.

फैसले के बारीक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इस मामले से जुड़े हरेक पक्ष ने अपनी भाषा और मुहावरों में निरंतर अस्पष्टता बरती. नियमनकर्ता नृपेंद्र मिश्र और दूरसंचार सचिव डी.एस. माथुर के बीच के झगड़े का पूरा रेकॉर्ड रखा गया है. यह पूर्ववर्ती और उत्तराधिकारी के बीच का झगड़ा है जिसमें मिश्र का पलड़ा, बेशक दूसरों के कुछ समर्थन के कारण, भारी दिखता है.

इससे सरकार के लिए चुनौती बड़ी हो जाती है कि जब नियमनकर्ता और प्रशासनिक मंत्रालय के बीच सही तालमेल न हो तो हालात कितने बुरे हो सकते हैं. पुराने ‘लाइसेंस राज’ की जगह ‘रेगुलेटर राज’ कोई नहीं चाहता लेकिन इसके साथ ही, रेगुलेटर को यह निगरानी रखने की जरूरत है कि नियमों का सही पालन हो ताकि किसी के साथ पक्षपात न हो. यह नाजुक संतुलन ही किसी क्षेत्रों के विस्तार और उसके शुरुआती विकास के चरण से आगे भी टिके रहने के लिए सही संस्थात्मक ढांचे का निर्माण करता है.

एक अलग तरह की निगरानी की व्यवस्था करने में ऑडिटर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है. इस तरह की निगरानी व्यवस्था को बेकाबू होने से रोकती है और उन विसंगतियों को उजागर करती है जिनकी यथावश्यक गहराई से जांच होनी चाहिए. लेकिन हमेशा के लिए यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ऑडिटर, नीतिनिर्माता और नियमनकर्ता संभवतः आंतरिक रूप से कार्य नहीं कर सकते, क्योंकि अगर वे ऐसा करेंगे तो वैसी तबाही मचेगी जैसी 2जी नीलामी में मची थी.

उनकी गलती क्या थी? जांच एजेंसियों को यहां विश्वास जगाना चाहिए था. अब यह मामला अपील में जाएगा, तब यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जांचकर्ताओं ने खराब काम किया, वे एक मामले को साबित करने के लिए ठोस सबूत नहीं जुटा पाए. जितने दावे किए जा रहे थे उनके मद्देनजर जांच एजेंसियों को कम-से-कम संदेह के सारे सूत्रों का तो खुलासा करना चाहिए था. इसकी जगह हासिल हुई धुंधले सुरागो की कहानी, ऐसे सुरागो की जो प्रायः देश की सीमा के पार जाकर खो जाते हैं.

यह और भी बुरी बात है, क्योंकि इस तरह के मामलों में अदालत के फैसले- जो चाहे आपको बरी करें या दोषी बताएं- जो भी हो, साजिश का पहलू तो जिंदा ही रहेगा और यह अंततः नुकसान ही ज्यादा पहुंचाएगा. यही वजह है कि हमारी जांच एजेंसियों- जो राजनीतिक जोड़तोड़ का जल्दी शिकार हो जाया करती हैं- का गिरता ग्राफ विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित करता है. और यह भारत की आर्थिक छवि को बेहतर बनाने में रोड़ा बनता है.

2जी मामला अब तक जिस तरह आगे बढ़ा है, उससे तो यही लगता है कि यह व्यवस्थागत विफलता का विशाल उदाहरण बनता जा रहा है, और यह कि व्यवस्था के रक्षकों यानी नौकरशाहों ने ही इसका यह हश्र किया है.

प्रणब धल सामंता दिप्रिंट के एडिटर हैं.

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