Tuesday, 4 October, 2022
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मस्जिद और मिलिट्री के बीच फिर फंसा पाकिस्तान

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जनरल कमर बाजवा राजनीति में फौज के सीधे दख़ल के खिलाफ प्रतीत होते हैं लेकिन, ख़ादिम रिज़वी और उनके साथी दबे-छिपे कह रहे हैं कि हो सकता है जनरल सही तबके के न हों।

यदि पाकिस्तान के इतिहास पर फिल्म बनाई जाए तो एक दृश्य कई बार दोहराया जाएगा पर हर बार नए पात्र के साथ। किसी मज़हबी मुद्‌दे पर कट्‌टरपंथी गलियों में दंगा कर रहे हैं, नागरिक सरकार के नेता कभी उन्हें पुचकारने तो कभी दबाने का प्रयास करते हैं पर उन्हें अहसास होता कि फौज के दखल के बिना स्थिति काबू नें नहीं की जा सकती। और उनके हर जगह मौजूद समर्थक फौज की ऐसी तस्वीर खींचते हैं कि वह देश को बचाने वाली एकमात्र शक्ति है।

हाल का उपद्रव तब शुरू हुआ जब आग उगलने वाले एक मौलवी के कोई तीन हज़ार समर्थकों ने इस्लामाबाद के प्रवेश को 6 नवंबर से बंद कर रखा । एजेंसियों की खबरों पर भरोसा करते तो ये लोग लाठियों व लोहे की छड़ों से लैस भी थे सुन्नी कट्‌टरपंथी गुट तहरीक़-ए-लबाइक पाकिस्तान (टीएलपी) के नेता ख़ादिम हुसैन रिज़वी के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों का कड़ाई से पालन कराने और अन्य धार्मिक पंथों के खिलाफ कड़ी कानूनों की मांग कर रहे थे।

21 करोड़ की आबादी वाले देश में तीन हज़ार लोगों के धरने से कानून-व्यवस्था अथवा सरकार की स्थिरता को कोई गंभीर खतरा नहीं होना चाहिए। लेकिन, जैसा कि पाकिस्तान हमेशा से रहा है, शेष दुनिया से अलग । अपने भाषणों में अपशब्द और पंजाब की घिनौनी गालियां देने वाले रिजवी ने ‘पैगंबर के सम्मान’ के स्वयंभू रक्षक हैं। वे नवीनतम पाकिस्तानी धार्मिक-राजनीतिक नेता है, जो हिंदू और यहूदी एजेंटों के खिलाफ खड़े हुए हैं और इस्लाम और पाकिस्तान के लिए फौज के साथ लड़ने की बात करते हैं।

रिज़वी के समर्थक ही पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं, जिनकी हत्या उनके ही बॉडीगार्ड ने जनवरी 2011 में इसलिए कर दी थी कि उन्होंने सुझाव दिया था कि पाकिस्तानियों को अपने ईशनिंदा कानूनों पर बहस करनी चाहिए।

वे उन कई सुन्नी बरेलवी मौलवियों में से हैं, जिन्हें पाकिस्तान के सैन्य-खुफिया गठजोड़ ने मुशर्रफ के नेतृत्व में और उसके बाद के वर्षों में देवबंदी और वहाबी मौलवियों के उदार विकल्प के रूप में तैयार किया था। देवबंदी व वहाबी मौलवियों को 1990 के दशक में जनरल जिया उल हक के मातहत पाकिस्तान सरकार का समर्थन मिला था।

रिज़वी के बड़े नतीजों वाला तुलनात्मक रूप से छोटा धरना रोचक है। यह पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को अपात्र घोषित करने, सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन के पुन: नेता चुने जाने और संसद द्वारा उस बिल को खारिज करने के बाद हुआ है जिसमें सांसद के रूप में अपात्र घोषित व्यक्ति को राजनीतिक दल का नेता बनना अवैध बताया गया था।

रिज़वी ने विरोध प्रदर्शन चुनावी नियमों में बदलाव के खिलाफ आहूत किया। उसके मुताबिक सांसदों द्वारा ली जाने वाली उस शपथ की भाषा बदल दी गई थी जिसमें हज़रत मोहम्मद को अल्लाह का आखिरी पैगंबर बताया गया है। मूल भाषा बहाल कर दी गई और सरकार ने कहा कि यह लिपिकीय भूल थी। लेकिन, रिज़वी के खून के प्यासे समर्थकों को हिंसा की धमकी देने के लिए इतना काफी नहीं था।

पंजाबी गालियों के बीच रिज़वी ने उनके पहले के सारे मज़हबी नेताओं की तरह घोषणा की, ‘हम जान दे देंगे पर अपनी मांगों से पीछे नहीं हटेंगे।’ उनके अनुयायी चिल्लाने लगे, ‘लाबाइक या रसूल, लाबाइक’ (मैं यहां हूं अल्लाह के पैगंबर, मैं यहां हूं)। उनके ध्यान में यह विडंबना नहीं आई कि वे एक मौलवी की अभद्र भाषा के जवाब में सम्मानजनक इरादा जाहिर कर रहे हैं।

तीन हज़ार प्रदर्शकारियों को पाकिस्तान फौज समर्थित टीवी चैनलों पर उससे अधिक वक्त मिला, जितना इस साइज़ की भीड़ को मिलना चाहिए। इससे मामूली अनशन क्रिकेट से राजनेता बने इमरान खान द्वारा आयोजित ‘धरने’ की तरह दिखने लगा, जिसने इस्लामाबाद को कुछ साल पहले कई दिनों तक पंगु बना रखा था। बात यह है कि पाकिस्तान में आमतौर पर हिंसक दंगे भड़काने और भीड़ द्वारा न्याय के लिए ईशनिंदा का सहारा ले लिया जाता है। यही वजह है कि घिरी हुई सरकार सावधानी बरत रही थी।

इस्लामाबाद हाई कोर्ट को प्रदर्शनकारियों को सड़कों से हटने का आदेश देना पड़ा। जब सरकार लगभग 20 दिनों के धैर्य के बाद हाई कोर्ट का अादेश हाथ में लेकर आखिरकार सक्रिय हुई तो इससे व्यापक हिंसा ही फैली।

फौज के प्रवक्ता ने ऐसे ट्वीट किया ताकि वह फौज प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच निष्पक्ष दिखाई दे। जैसे फौज सरकार का हिस्सा नहीं, उससे ऊपर हो। इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशन्स के मुखिया मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा, ‘सीओएएस ने प्रधानमंत्री को टेलीफोन किया। उन्होंने इस्लामाबाद धरने से दोनों पक्षों की ओर से हिंसा टालकर शांतिपूर्वक निपटने का सुझाव दिया, क्योंकि हिंसा राष्ट्रीय हित और एकता के लिए ठीक नहीं है।’

चूंकि यह पाकिस्तान है- कई तख़्तापलट और लगातार फौज के दख़ल की जमीन तो कोई यह नहीं पूछ सकता था कि रिज़वी ने अपनी रैली में ऐसा क्यों कहा, ‘फौज हमारे खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगी, क्योंकि हम उसी का काम कर रहे हैं।’ अफवाह है कि फौज घिरी हुई सरकार को बचाने के लिए नहीं बल्कि इसकी जगह देश को ठीक करने वाले टेक्नोक्रेट को लाने का नया प्रयोग करने के लिए कार्रवाई करेगी।

लेखक हर्बर्ट फेल्डमैन ने फील्ड मार्शल अयुब खान के दस साल की तानाशाही के अंत में पाकिस्तान के राजनीतिक जीवन का एक दुखद तथ्य बताया था। अयुब ने पांच माह चले दंगों के अंत में सत्ता अपने उत्तराधिकारी फौजी कमांडर जनरल याह्या खान को सौंपी। फेल्डमैन ने लिखा,‘ पाकिस्तान में यह व्यापक भावना है कि जनरल हैडक्वार्टर्स में जब भी यह महसूस किया गया कि चीजें उसके और वरिष्ठ फौजी अफसरों के मुताबिक नहीं चल रही है तो सैन्य बल (हकीकत में सिर्फ फौज) आगे आएगी या ऐसा करने की कोई तरकीब निकाल लेगी।’

फौज के मुखिया जनरल कमर बाजवा राजनीति में फौज के सीधे दखल के खिलाफ दिखाई देते हैं लेकिन, रिज़वी व उनके समर्थक ये आक्षेप (पूरी तरह गलत) लगाते रहे हैं कि जनरल शायद सही तबके के नहीं हैं। भावनात्मक उत्तेजना के ऐसे माहौल में स्थिति से निपटने में उन्हें सतर्कता बरतनी चाहिए, जहां उनकी अास्था ही सवालों के घेरे में है।

जो लोग मुल्ला और महत्वाकांक्षी फौजी अफसरों के बीच व्यापक मिलीभगत को समझना चाहते हैं उनके लिए मैंने ‘मस्जिद व मिलिट्री के बीच पाकिस्तान’ लिखी है। ऐसा लगता है कि उसमें मुझे एक नया अध्याय जोड़ना पड़ेगा, जिसे पिछले ही साल अपडेट किया गया था।

वॉशिंगटन डीसी स्थित हडसन इंस्टीट्यूट के दक्षिण और मध्य एशिया के डायरेक्टर हुसैन हक्कानी 2008-11 तक अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत थे। उनकी शीघ्र प्रकाशित होने वाली किताब है ‘रीइमेजिंग पाकिस्तान।’

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