Thursday, 24 November, 2022
HomeTalk Pointचुनाव आयोग को भारतीय नेताओं के चंगुल से बचाने की है जरूरत:...

चुनाव आयोग को भारतीय नेताओं के चंगुल से बचाने की है जरूरत: एस वाय कुरैशी

Text Size:

दिप्रिंट का सवालः

क्या पूर्व आइएएस अधिकारियों को चुनाव आयोग का कर्ताधर्ता नहीं बनना चाहिए, ताकि इसकी स्वतंत्रता बनी रहे?

शानदार प्रस्ताव। बशर्ते आप उनकी जगह देवदूतों को काम करने पर राजी कर लें.

वे कौन हो सकते हैं? राजनेता? अकादमकि लोग ? वकील? सामाजिक कार्यकर्ता? पत्रकार? स्वयंसेवक? या, न्यायाधीश (क्योंकि कुछ देशों में वे हैं जिनमें पड़ोसी पाकिस्तान भी शामिल है)?

मुझे वह मशहूर कहावत और गाना याद आ रहा है, जिसमें कहा गया है- पहला पत्थर पापी पर वह मारे, जिसने खुद कभी पाप नहीं किया हो.

यह सही है कि प्रभावकारी होने, ईमानदारी और न्याय के लिए प्रतिबद्ध चुनाव आयोग की छवि को किसी भी कीमत पर बचाना चाहिए. यह रिकॉर्ड की बात है कि चुनाव आयोग को सबसे भरोसे के संस्थानों में से एक माना जाता है, यदि सबसे अधिक भरोसेमंद न भी मानें तो.

हमारे प्रजातंत्र के पहले दिन से आइएएस (शुरू में आइसीएस) ने आयोग की बेहद भद्रता से सेवा की है. इसका सबसे अहम कारण यह था कि इन अधिकारियों ने अपने करियर के हरेक चरण में चुनाव करवाए हैं. ये वही हैं, जिन्होंने संस्थान को चमकाया. भारत का चुनाव आयोग पूरे प्रजातांत्रिक विश्व के लिए एक आदर्श है. हिलेरी क्लिंटन ने भारतीय चुनाव को ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ का बताया है और इस पर सभी भारतीयों को नाज होना चाहिए.

निस्संदेह कई बार दिक्कतें आयी हैं, लेकिन वे क्षणिक थीं. बहुसदस्यीय व्यवस्था ने व्यक्तिगत अहं (दुस्साहस) को भी किनारे रखने में सहायता की है.

आयोग के बारे में हालिया विवाद दुर्भाग्यपूर्ण है. इस महान संस्थान की गरिमा को बनाए रखना न केवल निवर्तमान अधिकारियो का, बल्कि सरकार और राजनेताओं का भी दायित्व है.

चुनाव आयोग को अगर किसी के चंगुल से बचाने की जरूरत है, तो वो राजनेताओं के चंगुल से है. खासकर, सत्ताधारी दल के। दुर्भाग्यपूर्ण है कि हरेक सरकार यही मानती है कि वह बेहतरीन है. वे अपनी ताकत कम करने से डरते हैं. जब बात राजनीतिक सत्ता की हो, तो देश जाए भाड़ में.

समाधान यह है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक कॉलेजियम के जरिए हो और मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन वरिष्ठता के आधार पर हो. यह अजीब है कि छोटी संस्थाएं जैसे सीआइसी या सीवीसी, जो खुद में संवैधानिक संस्थाएं भी नही हैं, के पास कॉलेजियम की व्यवस्था है. विडंबना ही है कि सीबीआइ का निदेशक, जो खुद एक संस्थान नहीं बल्कि सरकारी विभाग का एक अधिकारी मात्र है, भी इस व्यवस्था से आता है. हालांकि, सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर संवैधानिक निकाय को तत्कालीन सरकार के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है.

सरकार के पास पिछले तीन दशकों से यह सलाह भेजी जाती रही है. उन्होंने अपने अहंकार या स्थायित्व के भाव या फिर विशुद्ध लापरवाही की वजह से कोई ध्यान नहीं दिया. उनमें से अधिकांश इतिहास के कूड़ेदान के हवाले हो चुके हैं.

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका में इस मसले को लिया है. उम्मीद कीजिए कि आखिरकार सद्बुद्धि आए.

एस वाय कुरैशी भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त है.

Subscribe to our channels on YouTube & Telegram

Support Our Journalism

India needs fair, non-hyphenated and questioning journalism, packed with on-ground reporting. ThePrint – with exceptional reporters, columnists and editors – is doing just that.

Sustaining this needs support from wonderful readers like you.

Whether you live in India or overseas, you can take a paid subscription by clicking here.

Support Our Journalism

Most Popular