Indian Space Research Organisation satellite centre
Indian Space Research Organisation satellite centre | Lionel Bonaventure Pool/Getty Images
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2017 में भारतीय अनुसंधानकर्ताओं ने अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर जीव विज्ञान तक में शोध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिए.

बीता साल भारतीय विज्ञान के लिए काफी उत्साहवर्द्धक रहा. आविष्कारों में अघोषित वृद्धि से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने वाली उपलब्धियों के मामले में भारतीय वैज्ञानिकों ने पिछले साल कामयाबी के झंडे फहराए. 2017 में भारतीय अनुसंधानकर्ताओं ने अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर मानविकी तक में शोध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिए. ऐसा लगता है कि भारतीय वैज्ञानिक समुदाय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस आह्वान को गंभीरता से लिया कि हमें अपने देश को विज्ञान तथा तकनीक के क्षेत्र में सन् 2030 तक चोटी के तीन देशों की बराबरी में लाना है.

कामयाबियां बड़ी हो या छोटी, उन्हें कड़े परिश्रम से हासिल किया गया है. ये शोध तथा विकास (आर ऐंड डी) के क्षेत्र में वर्षों के प्रयासों, कम खर्चीले आविष्कार, ज्ञान की साझेदारी, और प्रायः संदेह तथा संसाधन की कमी के बावजूद उत्कृष्टम काम करने पर निरंतर ध्यान रखने का फल है.

2017: अंतरिक्ष में उड़ान

एक बड़ी उपलब्धि पिछले साल के शुरू में ही तब हासिल हुई जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक रॉकेट के उपयोग से 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण करके इतिहास रच दिया. इससे पहले 2014 में रूस ने इस तरह केवल 37 उपग्रहो का प्रक्षेपण किया था. जाहिर है इस रेकॉर्ड के टूटने पर दुनिया भर ने गौर किया. इसरो की बदौलत हम आज दुनिया के उन छह शीर्ष देशों में आ गए हैं, जो तकनीकी क्षमता के साथ अंतरिक्ष में विचरण करते हैं. भारत आज ग्लोबल स्पेस क्लब का विशिष्ट सदस्य बन गया है.

भारतीय वैज्ञानिकों ने खगोल विज्ञान के अब तक के इतिहास में हुए बड़े आविष्कारों में से एक में प्रमुख भूमिका निभाई है. उन्होंने गुरुत्वाकर्षणीय तरंगों का पहली बार पता लगाने में योगदान दिया है. भारत के कई संस्थानों के करीब 40 वैज्ञानिकं ने गुरुत्वाकर्षणीय तरंगों के आविष्कार पर प्रकाशित पर्चे में योगदान दिया है. इस पर्चे के अग्रणी वैज्ञानिकों को 2017 में भतिकशास्त्र में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

भारतीय खगोलशास्त्रियों तथा खगोलविदों ने चार अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित बेहद विशाल 43 आकाश -गंगाओं की भी, जो अब तक अज्ञात थीं, पहचान की और उन्हें सरस्वती नाम दिया.

जीव विज्ञान में बड़ा काम

भारतीय वैज्ञानिकों ने जीव विज्ञान में अनुसंधान के प्रतिस्पद्र्धी क्षेत्र में भी अपने कौशल का परिचय दिया. आविष्कृत उत्पादों के जेनरिक रूपों से असंतुष्ट कई भारतीय दवा कंपनियां खुद आविष्कार के क्षेत्र में उतर रही हैं. पिछले साल के शुरू में ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स ने मल्टीपल मायलोमा नामक बीमारी की अपनी प्रयोगात्मक एंटीबॉडी दवा का मनुष्य पर प्रयोग करने की अनुमति अमेरिका के एफडीए से हासिल की है. सन फार्मा ने भी सोरेसिस नामक बीमारी की नई दवा बनाने की दिशा में प्रगति की है.

स्ट्रैंड लाइफ साइंसेज, मजूमदार शॉ सेंटर फॉर ट्रांसलेशनल रिसर्च और मजूमदार शॉ मेडिकल सेंटर के बीच करीबी सहयोग के चलते कैंसर का पता लगाने की दिशा में नई उपलब्धि हासिल हुई है. इसके कारण स्ट्रैंड लाइफ साइंसेज भारत में क्रांतिकारी लिक्विड बायोप्सि विधि को लाने वाली पहली कंपनी बन गई है. इस विधि से कैंसर का पता खून की जांच करके लगाया जा सकता है.

भारतीय वैज्ञानिकों ने आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की मदद से कैंसर का जल्दी पता लगाने की एक अनूठी विधि ईजाद की है. कोलकाता का भारतीय विज्ञान शिक्षा तथा अनुसंधान संस्थान (आइआइएसईआर) और आइआइटी कानपुर ने एआइ आधारित एलॉगरिथम विकसित किया है जो ऊतकों से टकराकर फैले प्रकाश का उपयोग करके सामान्य और कैंसरग्रस्त ऊतकों के बीच अंतर को काफी तेजी तथा शुद्धता से स्पष्ट करता है. दूसरी जगह, इंस्टीट्यूट ऑफ जिनोमिक्स ऐंड इटीग्रेटिव बायोलॉजी (आइजीआइबी) के वैज्ञानिकों ने जिनेटिक रोग फ्रेडरिख एटेक्सिया के उपचार के आविष्कार में प्रमुख भूमिका निभाइ है. इस रोग में मरीज का स्नायुतंत्र खराब हो जाता है और उसकी सामान्य गतिविधियां कुप्रभावित होती हैं. अगर सफल हुआ तो यह नया उपचार स्नायुतंत्र संबंधी लाइलाज रोगों को दूर कर सकता है.

बायोकॉन ने नाम कमाया

हमलोग बेमिसाल वैज्ञानिक प्रतिभाओं के बूते भारत को मिली बढ़त का लाभ उठाकर बायोटेक्नोलॉजी आधारित उपचारों का आविष्कार करने में जुटे हैं जिससे दुनियाभर में असाध्य बीमारियों के इलाज में भारी सुधार आए. 2006 में मस्तिष्क तथा गले के कैंसर के लिए नीमोटुजुमैब नामक पहली विशिष्ट दवा, 2013 में सोरोसिस के लिए इटोलिजुमैब नामक बायोलॉजिक उपचार प्रस्तुत करने के बाद हम मरीजों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न उपचारों की खोज में जुटे हैं.

हालांकि 2017 एक चुनौतीपूर्ण साल था, फिर भी हमने इसे अपनी विकसित आर ऐड डी क्षमता के बूते उल्लेखनीय उपलब्धि के साथ उत्साह के साथ विदा किया. बायोकॉन तथा माइलान ने स्तन तथा उदर कैंसर की जो ट्रास्टुजुमैब नामक बायोसिमिलर ऐंटीबॉडी दवा विकसित की उसे अमेरिकी एफडीए ने मंजूरी दे दी है. यह भारत और बायोकॉन के लिए मील का एक बड़ा पत्थर है, क्योंकि हम भारत की पहली कंपनी बन गए हैं जिसे अमेरिका में बायोसिमिलर स्वीकृति मिली है. इससे बायोकॉन न केवल बायोलॉजिक्स में भारत की ओर से विश्वसनीय खिलाड़ी बन गई है बल्कि पूरी दुनिया के विशिष्ट बायोसिमिलिर खिलाड़ियों की जमात में शामिल हो गई है.

हमने मेटास्टैटिक कोलोरेक्टल (उदर-मलद्वार) कैंसर, फेफड़े, किडनी, सर्वाइकल, अंडाशय, मस्तिष्क आदि के कैंसर की बाय¨सिमिलर ऐंटीबॉडी दवा ‘क्राबेवा’ (बेवासिजुमैब) प्रस्तुत की.

ये सारी उपलब्धियां विज्ञान तथा मैनुफैक्चरिंग में हमारे देश की क्षमता को प्रमाणित करती हैं कि हम सर्वश्रेष्ठ वैश्विक स्तर की बायोसिमिलर दवाएं बना सकते हैं.

डेटा विज्ञान का उत्कर्ष

भारत को इसके डेटा वैज्ञानिकं की उत्कृष्टता के लिए दुनियाभर में मान्यता मिल रही है. ये वैज्ञानिक प्रमाण आधारित निर्णय को आसान बनाते हैं. डेटा एनालिसिस की हमारी क्षमता के कारण तकनीक, व्यापार तथा गणित के मेल से निर्णय विज्ञान का जन्म हुआ है और इस तरह नए मनुष्य-मशीन इकोसिस्टम का विकास हुआ है.

आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के क्षेत्र में निरंतर विकास के कारण बेहद कुशल पेशवरों की मांग काफी बढ़ गई है. पिछले एक साल में भारत में एनालिटिक्स के रोजगार में लगभग दोगुना वृद्धि हुई है. बंगलूरू की मू सिग्मा भारत की उन पहली कंपनियों में शुमार हो गई है जिन्होंने इस प्रवृत्ति को पहले ही भांप लिया था और उसने मौके का लाभ उठाकर अरब डॉलर मूल्य की कंपनी खड़ी कर ली है जिसके ग्राहकों में प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल हैं. इस तरह के हुनर की अन्यत्र कमी के कारण चूंकि डेटा एनालिटिक्स की ज्यादा परियोजनाएं भारत में आ रही हैं, हम आगे इस क्षेत्र में भारी उछाल देख सकते हैं.

उत्कृष्टता के प्रयास

भारत के वैज्ञानिक समुदाय ने विज्ञान में उत्कृष्टता के नए मानदंड तय कर दिए हैं और 2017 में भारत के लिए एक शक्तिशाली तथा विशद ब्रांड तैयार कर दिया है. उत्कृष्टता की हमारी यह खोज नए साल में और उससे आगे भी जारी रहेगी. यहां मैं अपने सभी वैज्ञानिकों को धन्यवाद देना चाहूंगी जिनकी उपलब्धियों ने हरेक भारतीय में राष्ट्रीय गौरव का भाव भर दिया है. हमारे वैज्ञानिक विकास ने साबित कर दिया है कि इरादा पक्का हो और मन में जोश हो तो हम विज्ञान तथा तकनीक और उत्कृष्ट आविष्कार के क्षेत्र में सबसे आगे निकल सकते हैं.

नया साल मुबारक हो!

किरण मजूमदार शॉ एक उद्यमी हैं और ‘दिप्रिंट’ की एक निवेशक हैं

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