तमाम घोषणाओं के बावजूद एक भी बड़ा प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुआ है. लगभग एक साल हाथ में रह गया है, मोदी सरकार के पास 2019 में दिखाने लायक शायद बहुत नहीं हो.

यह खरी-खरी कहने का वक्त है. रक्षा क्षेत्र के लिए, जिसे इस प्रयास का महत्वपूर्ण अंग माना जा रहा था, सारे प्रयासों या दावों के बावजूद तीन वर्षों में कोई भी परियोजना सिरे नहीं चढ़ी है.

नरेंद्र मोदी सरकार के सबसे बड़े प्रयासों में एक- रक्षा क्षेत्र की बड़ी परियोजनाओं में निजी क्षेत्र को ‘रणनीतिक साझीदार’ के तौर पर शामिल करना- इतनी समीक्षाओं, संशोधनों, अपेक्षाओं औऱ व्याख्याओं से गुजरा है कि इसके पूरे विचार का धरातल ही हिलता हुआ प्रतीत हो रहा है.

यह बहुत आराम से कह सकते हैं कि इस कार्यकाल में, काम की रफ्तार को देखते हुए, राजग सरकार शायद ही वैसी किसी परियोजना को शुरू कर सके, जिसमें निजी क्षेत्र को फाइटर जेट्स, टैंक औऱ पनडुब्बी बनानी है.

इसका लक्ष्य ऐसी प्रक्रिया को शुरू करना है, जहां भारत खुद के बोइंग और लॉगहीड मार्टिन बना सके, ताकि वैश्विक बाज़ार में उपस्थिति दर्ज करा सके. हालांकि, अभी तो हालात ये हैं कि जिन भारतीय कंपनियों ने रक्षा क्षेत्र में निवेश किया, वे दिवालिया होने की कगार पर हैं, जिनमें से कुछ को तो दीवाला-कार्यवाही का भी सामना करना पड़ा है.

समस्या यह है कि अब समय नहीं है. रणनीतिक साझीदारी योजना में, जिस पर मेक इन इंडिया के करोड़ों डॉलर के प्रोजेक्ट दांव पर हैं, केवल एक साल का समय है और उसके बाद अगर सरकार बदली तो सारी चीजें अधर में होंगी, खुदा न खास्ता अगर वे शुरु हो पाएं तो.

एक बड़ी परियोजना के लिए किसी भारतीय निजी कंपनी को चुनना एक लंबी प्रक्रिया है. निविदाएं मंगाने से लेकर वित्तीय मूल्यांकन करना, तकनीकी क्षमता जांचना औऱ फिर मूल्य और डिलीवरी पर कई दौर की चर्चा. प्रक्रिया न केवल लंबी है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में काम कर रही कई बीमारियों से भी ग्रस्त है- गलत आंकड़ेबाजी, लॉबीइंग और उलटफेर, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं.

भारत ने आजतक जो सबसे तेज़ सैन्य खरीदारी हालिया वर्षों में की है, वह वायुसेना के लिए ‘बेसिक ट्रेनर’ की आपातकालीन खरीद थी. सुरक्षा कारणों से HPT-32 एयरक्राफ्ट को बैठा देने के बाद, भारतीय वायुसेना ने तत्कालीन संप्रग सरकार पर दबाव डलवाकर बहुत तेज़ी से 2009 में खरीद करवायी थी. फिर भी, टेंडर निकालने से लेकर हस्ताक्षर होने तक तीन साल लगे थे.

रणनीतिक साझेदारी योजना में शुरुआती दिक्कतें तय हैं, क्योंकि यह सर्वथा नया, अनूठा और बिना परीक्षण किया मॉडल है. अभी तक तो चयन शुरू करने के लिए टेंडर्स तक नहीं आए हैं. यह बिल्कुल ही अलग कहानी है कि जो ‘बेसिक ट्रेनर’ का ऑर्डर आखिरकार 2012 में स्विस कंपनी पाइलाटुस को मिला, वह फिलहाल सीबीआई जांच झेल रहा है. इसमें वायुसेना पर चयन प्रक्रिया में .अवांछित तरफदारी’ का आरोप है. यह ऐसी जांच है, जिसने नौकरशाही के साथ ही एयरफोर्स के शीर्षस्थ अधिकारियों के माथे पर बल ला दिए हैं.

AON की कहानी

तो, रक्षा क्षेत्र के बारे में ऐसा क्या है कि इसे इतना उत्तेजक बनाता है? पिछले वर्षों में लगभग हरेक महीने किसी बड़ी परियोजना के बारे में घोषणा होती रही है, जिसमें हज़ारों करोड़ रुपए लगे होते हैं, कि उन पर मुहर लग गयी.

मंत्रालय में एक बड़ा चुटकुला एओएन स्कैम (AON घोटाला) के बारे में है. ध्यान रहे कि यह कोई भ्रष्टाचार का आदर्श नमूना नहीं है, जहां बिचौलिए और कमीशन शामिल है. यह तो ऐसा दृष्टिभ्रम है जो दिखाता है कि सब कुछ ठीक चल रहा है. सैन्य खरीद का सबसे पहला चरण एओएन (AON) या एक्सेपटेंस ऑफ नेसेसिटी यानी जरूरत को स्वीकारना होता है.

सीधे शब्दों में कहें तो इसका मतलब है कि सरकार सैद्धांतिक तौर पर सहमत हो गयी है कि कही जा रही सेवाओं, जैसे एक नए राइफल या पनडुब्बियों की टुकड़ी, की सचमुच जरूरत है. इसका मतलब आगे की प्रक्रिया के लिए मंजूही देना भी है. सभी AON का नतीजा टेंडर निकलने में नहीं होता और कई बार तो इसलिए खारिज हो जाती हैं कि किसी तकनीकी या वित्तीय मसले की वजह से वह सेवा आगे बढ़ने में नाकाम रही.

हालांकि, अधिकांश AON के मंत्रालय से मंजूरी को एक उत्सव की तरह मनाया जाता है, जिसे मेक इन इंडिया के लिए नया पन्ना कहा जाता है. संसद में हाल ही में ‘मेक इन इंडिया’ की उपलब्धि पर सवाल पूछे जाने पर रक्षा मंत्रालय ने फिर से उन्हीं AON की सूची लहरा दी, जिन को पिछले तीन वर्षों में मंजूरी मिली है.

आंकड़े शानदार दिखते हैं- कुल 143 संपत्ति अधिग्रहण (कैपिटल अक्यूजिशन) को मंजूरी मिली है, पिछले तीन साल में सरकार से. यानी इनका AON स्वीकार लिया गया है, जिसमें से 2.33 लाख करोड़ के लगभग 105 प्रस्तावों को ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रेखांकित किया गया है.

जवाब में यह भी बताया गया है कि इन परियोजनाओं पर हस्ताक्षर से लेकर कार्यान्वयन के बीच लगबग डेढ़ से ढाई वर्ष का समय है. मेक इन इंडिया के तहत एक भी प्रस्ताव पूरी तरह मंजूर नहीं किया गया है, अब तक.

जहां तक निजी क्षेत्र का सवाल है, रक्षा अब एक स्थिर क्षेत्र है। जिन कंपनियों ने छलांग लगायी और ऑर्डर की प्रत्याशा में काफी सारी भर्तियां भी कर लीं, अब कर्मचारियों की छंटनी कर रही है, जिनमें से कई तो सार्वजनिक उपक्रमों से लिए गए थे. कम से कम एक शिपयार्ड तो पूरी तरह बंद होने की कगार पर है, जबकि दूसरे भयानक घाटा सह रहे हैं.

यह क्षेत्र कमज़ोर दिल वालों के लिए नहीं है. अभी जैसी चीजें चल रही हैं, फिलहाल तो कहानी खत्म दिखती है और गेंद 2019 में आनेवाली नयी सरकार के पाले में दिखती है.

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